अज़ीम मुजाहिद-ए-आज़ादी यूसुफ़ मेहर अली ने दिया था भारत छोड़ो का नारा
✅ एमडब्ल्यू अंसारी : भोपाल
मुल्क को आज़ाद हुए 78 साल हो चुके हैं। आज़ादी की जद्द-ओ-जहद, यकजहती, आपसी भाईचारे के अलावा एक काबिल-ए-फख्र वाकेआ भारत छोड़ो तहरीक था। इतने अर्से बाद भी ये तहरीक अवाम के लिए ताक़त की एक रोशन मिसाल है। आज ज़रूरत इस बात की है कि जिन्होंने सालों साल से हमारे तहज़ीबी विरसे को महफ़ूज़ रखने में अहम किरदार अदा किए हैं, उन्हें याद किया जाए। बहुत से ऐसे मुजाहिदीन हैं, जो अब भी गुमनामी के अंधेरे में कहीं गुम हैं। बता दें कि बंबई के गोवा लिया टैंक मैदान पर 8 अगस्त 1942 को कुल हिंद कांग्रेस कमेटी ने ''भारत छोड़ो' क़रारदाद मंज़ूर की और 9 अगस्त को हिन्दोस्तान का हर ख़ास-ओ-आम इसमें कूद पड़ा था। जिसे देखकर अंग्रेज़ों में खलबली मच गई लेकिन सितम ज़रीफ़ी देखिए कि हम में से कितने लोग इस तारीख़ी हक़ीक़त से वाक़िफ़ हैं कि जद्द-ओ-जहद आज़ादी के दो ऐसे नारे, जो तारीख़-ए-हिंद में संग-ए-मील की हैसियत रखते हैं, वो बंबई के मेयर यूसुफ़ मेहर अली ने दिए हैं।
वे महात्मा गांधी से नज़दीकी क़राबत रखते थे और मुख़ालिफ़ीन के आगे चट्टान की तरह डटे रहे, तहिरीक-ए-आज़ादी में उनकी इतनी बड़ी शराकत है, जिसे कभी फ़रामोश नहीं किया सकता।
ये वही यूसुफ़ मेहर अली अज़ीम मुजाहिद आज़ादी हैं, जिन्हों ने अंग्रेज़ों के बारे में कहा था,
The British rulers are like dogs, If you kick them, they will lick you, But if you lick them, they will kick you"
8 अगस्त 1942 को कांग्रेस पार्टी ने मुंबई इजलास में मौलाना आज़ाद की सदारत और यूसुफ़ मेहर अली के नारे के साथ ''भारत छोड़ो' तहरीक शुरू की तो उसमें बिला तफ़रीक़ मज़हब-ओ-मिल्लत मुआशरे के हर तबक़े ने खासतौर पर ख़वातीन ने बड़े पैमाने पर हिस्सा लिया।
उनमें सरे फेहरिस्त महात्मा गांधी के साथ मौलाना अबुल-कलाम आज़ाद, सुभाषचंद्र बोस, अशोक महित, जय प्रकाश नारायण, पण्डित जवाहर लाल नहरू वग़ैरा पेश-पेश रहे। तहरीक अगस्त या ''भारत छोड़ो' ने अंग्रेज़ों के हवासबाख़ता कर दिए और अंग्रेज़ी हुकूमत की चूलें हिल गईं। इस तहरीक का ख़ौफ़ इतना हुआ कि तमाम कांग्रेस लीडरान को अंग्रेज़ हुकूमत ने जेलों की सलाख़ों के पीछे भेज दिया। इन मर्द मुजाहिदीन के साथ शामिल ख़वातीन मुजाहिदीन तमाम लीडरान के जेल जाने के बाद मोर्चा सँभाले हुए थीं, इनमें सरे-ए-फ़हरिस्त अरूना आसिफ़ अली, सरोजनी नायडू, बेगम उर्फ़ बी अम्मां, फ़ातिमा इस्माईल, रिहाना तैय्यब जी, फ़ातिमा तुय्यब जी, हमीदा तैय्यब जी, और सुग़रा ख़ातून वग़ैरा शामिल हैं। इन तमाम जाँ-बाज़ ख़वातीन ने तमाम तकालीफ़ को हंसते हुए बर्दाश्त किया और अपने वतन से सच्ची मुहब्बत का सबूत पेश करते हुए अपना सब कुछ निछावर कर दिया।
वे महात्मा गांधी से नज़दीकी क़राबत रखते थे और मुख़ालिफ़ीन के आगे चट्टान की तरह डटे रहे, तहिरीक-ए-आज़ादी में उनकी इतनी बड़ी शराकत है, जिसे कभी फ़रामोश नहीं किया सकता।
ये वही यूसुफ़ मेहर अली अज़ीम मुजाहिद आज़ादी हैं, जिन्हों ने अंग्रेज़ों के बारे में कहा था,
The British rulers are like dogs, If you kick them, they will lick you, But if you lick them, they will kick you"
8 अगस्त 1942 को कांग्रेस पार्टी ने मुंबई इजलास में मौलाना आज़ाद की सदारत और यूसुफ़ मेहर अली के नारे के साथ ''भारत छोड़ो' तहरीक शुरू की तो उसमें बिला तफ़रीक़ मज़हब-ओ-मिल्लत मुआशरे के हर तबक़े ने खासतौर पर ख़वातीन ने बड़े पैमाने पर हिस्सा लिया।
उनमें सरे फेहरिस्त महात्मा गांधी के साथ मौलाना अबुल-कलाम आज़ाद, सुभाषचंद्र बोस, अशोक महित, जय प्रकाश नारायण, पण्डित जवाहर लाल नहरू वग़ैरा पेश-पेश रहे। तहरीक अगस्त या ''भारत छोड़ो' ने अंग्रेज़ों के हवासबाख़ता कर दिए और अंग्रेज़ी हुकूमत की चूलें हिल गईं। इस तहरीक का ख़ौफ़ इतना हुआ कि तमाम कांग्रेस लीडरान को अंग्रेज़ हुकूमत ने जेलों की सलाख़ों के पीछे भेज दिया। इन मर्द मुजाहिदीन के साथ शामिल ख़वातीन मुजाहिदीन तमाम लीडरान के जेल जाने के बाद मोर्चा सँभाले हुए थीं, इनमें सरे-ए-फ़हरिस्त अरूना आसिफ़ अली, सरोजनी नायडू, बेगम उर्फ़ बी अम्मां, फ़ातिमा इस्माईल, रिहाना तैय्यब जी, फ़ातिमा तुय्यब जी, हमीदा तैय्यब जी, और सुग़रा ख़ातून वग़ैरा शामिल हैं। इन तमाम जाँ-बाज़ ख़वातीन ने तमाम तकालीफ़ को हंसते हुए बर्दाश्त किया और अपने वतन से सच्ची मुहब्बत का सबूत पेश करते हुए अपना सब कुछ निछावर कर दिया।
ये बात भी काबिल-ए-ग़ौर है कि इस अज़ीम जंग-ए-आज़ादी में जहां मर्द-ओ-ख़वातीन ने जान की बाज़ी लगा दी वहीं दूसरी जानिब इस तहरीक को कमज़ोर करने के लिए भरपूर कोशिशें भी की गई।
नैरंगे सियासत दौरां तो देखिए,
मंज़िल उन्हें मिली जो शरीक-ए-सफ़र ना थे।
1942 में महात्मा गांधी की भारत छोड़ो मुहिम ने अंग्रेज़ों को मुल्क से बाहर किया था। नए भारत के वज़ीर-ए-आज़म ने कहा था, हम ग़रीबी, अदम मुसावात, ना ख़्वान्दगी, खुले में रफ़ा हाजत करने, दहश्तगर्दी और इमतियाज़ का सफ़ाया करने का अह्द करते हैं और उन तमाम बुराईयों से भारत छोड़ दो कह सकते हैं।' ये और बात है कि उम्मीद के मुताबिक़ कामयाबी नहीं मिली और इस पर सुबाई सरकार और क़ौमी सरकार खरी नहीं उत्तरी। बल्कि आज पूरा भारत ये महसूस कर रहा है कि क़ौमी सरकार हो या सूबाई सरकारें अपने वादों को पूरा नहीं पा रही हैं, बल्कि उसके बरअक्स हो रहा है। भारत की साझी विरासत, भाई चारा, आपसदारी सब कुछ तहस नहस होकर रह गया है।
इस नारा ने भारत की आज़ादी में कलीदी किरदार अदा किया। ''भारत छोड़ो तहरीक' भारत की जद्द-ओ-जहद में एक अहम संग-ए-मील थी। महात्मा गांधी की क़ियादत में पूरे भारत में लोग साम्राज्य को ख़त्म करने के लिए इकट्ठे हुए। 1942 में उस दिन गांधी जी ने भारत के लोगों को मुल्क से अंग्रेज़ों को निकालने के लिए 'करो या मरो का नारा दिया। हमें आज़ादी तब मिली जब मुल्क के अवामुन्नास इस तहरीक में शामिल हुए। आज तहरीक-ए-आज़ादी के जज़बे को उजागर किया जा रहा है ताकि नौजवान और आने वाली नसलें उस वक़्त के हमारे हम वतनों की क़ुर्बानीयों और तहरीक जंग-ए-आज़ादी और साझी विरासत के बारे में जान सकें।
भारत छोड़ो तहरीक दूसरी जंग-ए-अज़ीम के दौरान 9 अगस्त 1942 को महात्मा गांधी और कांग्रेस के तमाम लीडरान के ज़रीये शुरू की गई थी जिसका मुतालिबा भारत में बर्तानवी साम्राज्य का ख़ातमा था।
आईपीएस (रिटायर्ड डीजीपी, छत्तीसगढ़)