रियाद : आईएनएस, इंडिया
किंग अब्दुल अजीज सेंटर फार वर्ल्ड कल्चर ‘इसरा’ ने हिजरत की नुमाइश के दौरान पैगंबर-ए-इस्लाम हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के तबर्रुर्कात की कापी को लोगों की जियारत के लिए पेश किया है।

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1287 में वफात पाने वाले मराकश के मुहद्दिस इब्न असाकिर के मुताबिक नबी-ए-करीम सल्लल्लाह अलैहे वसल्लम से मंसूब (जुड़ी हुई) बाबरकत अश्या (चीजों) की कापियां अंदलुस के कारीगरों ने 13 वीं सदी में तैयार की थीं। ये नुस्खे आम तौर पर इस्लामी दारुल हुकूमतों में उलमाए हदीस (हदीस के जानकारों) में तकसीम किए जाते हैं। इन उलमा को रसूल अल्लाह सल्लल्लाह अलैहि वसल्लम की तालीमात और अहादीस को महफूज करने और मुंतकिल (टांसफर) करने की जिÞम्मेदारी सौंपी जाती है। इस नुमाइश का इफ़्तिताह (उदघाटन) सऊदी मशरिकी सूबे के गवर्नर शहजादा सऊद बिन नाईफ बिन अब्दुल अजीज ने नए हिजरी साल के आगाज पर किया था। नुमाइश के इफ़्तिताह के मौका पर सऊदी आला हुक्काम, इस्लामी फन-ओ-तारीख के मुहक़्किकीन (शोधकर्ता), दानिशवरों (बुद्धिजीवियों) और दुनियाभर से आए दीगर मुअज्जिज मेहमान मौजूद थे।
याद रहे, ये नुमाइश नौ माह तक जारी रहेगी और फिर उसका इनइकाद (आयोजन) रियाज, जद्दा और मदीना मुनव्वरा में किया जाएगा। उसके बाद ये नुमाइश दुनियाभर के कई शहरों में जाएगी। इस नुमाइश का मकसद नबी-ए-करीम सल्लील्लाह अलैहि वसल्लम के मक्का मुकर्रमा से मदीना मुनव्वरा तक के सफर हिजरत पर रोशनी डालना है। उसी दौरान शाह अब्दुल अजीज सेंटर फार वर्ल्ड कल्चर इसरा के डायरेक्टर अबदुल्लाह अलराशिद ने कहा कि पैगंबर अकरम सल्लल्लाह अलैहि वसल्लम के नक्श-ए-कदम पर हिजरत ना सिर्फ एक नुमाई है बल्कि एक मरबूत (एकीकृत) क्वालिटी प्रोजेक्ट है, जिसे असरी (समकालीन) अंदाज में एक गैरमामूली और बेमिसाल उस्लूब (शैली) में एक सफरी आलमी नुमाइश के जरीये पेश किया गया है। इसमें नवादिरात (पुरानी चीजें) और ऐसी अश्या शामिल की गई हैं जिनका ताल्लुक हजरत नबवी सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से है और उन्हें माहिरीन की जेर-ए-निगरानी तैयार किया गया है। उन्होंने मजीद कहा कि इसरा सेंटर तीन साल से नुमाइश की तैयारी और डिजाइनिंग पर काम कर रहा था। उसकी तैयारी में 70 से जाइद मुहक़्किकीन (शोधकर्ताओं) और आर्टिस्टों ने हिस्सा लिया और इंतिहाई मेहनत से अश्या डिजाइन कीं। उन्होंने निशानदेही की कि नुमाइश में फन पारों (कलाकृति) का एक ग्रुप दिखाया गया है, जिसमें टेक्सटाइल, मखतूतात और नवादिरात का जखीरा भी शामिल है। ये नवादिरात (पुरानी चीजें) इस्लामी तहजीब की भरपूर अक्कासी करती हैं।