मिल्लत-ए-इस्लामिया की बेदारी और उसकी निशात सानिया (पुर्नजागरण) के लिए जरूरी है कि मस्जिद की मर्कजीयत बहाल की जाए, मसाजिद में मजबूत निजामे तालीम कायम की जाए। इन तास्सुरात का इजहार नायब अमीर शरीयत इमारत शरयह बिहार, उड़ीसा व झारखंड मौलाना मुहम्मद शमशाद रहमानी कासिमी ने किया।
उन्होंने कहा कि इस्लाम में मस्जिद की अहमीयत इस कदर है कि रसूल पाक सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने मदीना मुनव्वरा हिज्रत फरमाने के बाद सबसे पहले मस्जिद नबवी की तामीर फरमाई, यहां तक कि उसे अपने घर की तामीर पर भी मुकद्दम फरमाया, साथ ही मस्जिद नबवी के हिस्से ही में तालीम के लिए एक मखसूस चबूतरा की तामीर फरमाई जो आज भी इसी मुकाम पर अस्हाब सफा के नाम से जाना जाता है। उन्होंने मजीद कहा कि मस्जिद नबवी इबादत-ओ-रियाजत, दावत-ओ-तब्लीग, तालीम व तरबीयत के साथ तमाम दीनी व मुल्की और सकाफ़्ती (सांस्कृतिक) सरगर्मियों का मर्कज थी, अह्दे रिसालत के बाद खलीफ़ा-ए-राशिदीन और ताबईन-ओ-तबा ताबईन के जमाने में भी मुस्लिम मुआशरा में मस्जिद को मर्कजी हैसियत हासिल थी और इससे तमाम दीनी तालीमी और दावती उमूर अंजाम पाते थे, लेकिन बाद की सदियों में ज्यों-ज्यों दीन से दूरी बढ़ती गई, मस्जिद की मर्कजीयत भी मुतास्सिर होती गई।
उन्होंने कहा, इमारत शरयह ने महसूस किया कि इस वक़्त उम्मत की रहनुमाई की सख़्त जरूरत है, इस काम के लिए मसाजिद सबसे ज्यादा मूसिर (प्रभावशाली) जगह है, लिहाजा अमीर शरीयत मौलाना सय्यद अहमद वली फैसल रहमानी ने फैसला किया है कि शोबा उमूर मसाजिद इमारत शरयह के जेरे एहतिमाम हर जिÞला में अइम्मा किराम और जिम्मादारान मसाजिद की नशिस्तें मुनाकिद की जाएं। उन्होंने कहा कि मिल्लत-ए-इस्लामीया पर लाजिम है कि वो मस्जिदों से अपने ताल्लुक को मजबूत करें और मस्जिद को ज्यादा से ज्यादा आबाद करने की फिक्र करें, जब सर्वे का अमल शुरू हो तो अपनी जमीनों के सर्वे के साथ लाजिÞमी तौर पर अपनी मसाजिद का सर्वे कराएं, और इसमें साफ तौर पर मस्जिद लिखवाएं, अगर जमीन का कागज नहीं है, तो कागज तैयार करने की फिक्र आज ही से शुरू कर दें।
