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मकबूजा बैतुल मुकद्दस : मकबूजा बैतुल मुकद्दस में खुदाई के दौरान मादूम (दुर्लभ) हाथी का एक दांत मिला है। यह दांत आठ फुट लंबा और बिल्कुल सीधा है। इससे बहुत से नए और दिलचस्प सवालात उभरते हैं। इसराईल के माहिरीन आसारे-ए-कदीमा (पुरातत्व विशेषज्ञ) के मुताबिक ये एक देव हैकल हाथी का मुकम्मल दांत है, जो कभी बहीरा रुम के आसपास पाया जाता था। माहिरीन के मुताबिक ये तकरीबन पाँच लाख बरस पुराना हाथी का दाँत है। इसराईली महिकमा आसारे-ए-कदीमा (आईए) के माहिर ईवी लेवी, जो इस खुदाई की सरबराही कर रहे थे, ने बुध के रोज कहा कि ये इसराईल या फिर मशरिक (पूर्व) से दरयाफ्त होने वाला अब तक का सबसे बड़ा हाथी दांत है। इसका ताल्लुक सीधे दाँतों वाले उस हाथी से है, जिसकी नसल काफी पहले मादूम (दुर्लभ) हो चुकी है। बरामद दांत, आज के दौर में बड़े अफ्रÞीकी नसल के हाथी से भी काफी बड़ा है। जो चीज इस दांत को मजीद दिलचस्प बनाती है, वो ये है कि ये एक ऐसे इलाके में पाया गया, जहां से पत्थर और चकमक के औजार और दूसरे जानवरों की दीगर बाकियात (अवशेष) बरामद हुए हैं। आईएए से वाबस्ता माहिर आसारे-ए-कदीमा ओमरी बारजीलाई ने इस बात की वजाहत करते हुए कहा कि फिलहाल यह पता लगाना है कि हाथी का मौका पर ही शिकार किया गया था या वो उसे कहीं दूसरी जगह मारा गया था। अथार्टी का कहना है कि इसराईल की ये जगह तकरीबन पाँच लाख बरस पहले के दौर की है जिसके आसपास खुदाई में पत्थर के औजार पर मबनी बहुत सी दीगर चीजें पहले दरयाफत की जा चुकी हैं। लेवी ने कहा कि उस दौर में जो इन्सान इस खित्ते में आबाद थे, उनकी शिनाख़्त भी एक पहेली है, जो अफ्रÞीका से एशिया और यूरोप तक एक पुल के रास्ते से आए थे।
लापता जर्मन शख़्स की लाश 32 बरस बाद स्विस ग्लेशीयर में दबी मिली
बर्लिन : जर्मनी के 27 साला नौजवान सन 1990 में तन्हा कोहे पैमाई (पर्वतारोहण) के दौरान कोह एल्पस में लापता हो गए थे। तकरीबन 32 बरस बाद कोहे पैमाओं (पर्वतारोहियों) को उनकी लाश ग्लेशियर के नीचे दबी मिली। इस तरह तीन दहाईयों बाद ये मुआमला बिलआखिर हल हो गया।
सन 1990 की दहाई में पैदल सफर के दौरान लापता हो जाने वाले जर्मन शख़्स की बाकियात (अवशेष) स्विटजरलैंड की जरमट पहाड़ी के एक तफरीही मुकाम से मिली। एल्पस की गहिराईयों में ये इलाका बलंद तरीन पहाड़ी चोटियों का गढ़ है। कोह पैमाओं ने जुलाई के आखिर में एक ग्लेशियर पर लाश के साथ ही पैदल सफर में इस्तिमाल होने वाली दूसरी चीजें भी दरयाफत कीं थी। उसके बाद हुक्काम ने डीएनए टेस्ट कराया जिसमें इस बात की तसदीक हुई कि ये बाकियात जर्मनी के 27 साला नौजवान की हैं। स्विटजरलैंड टाईम्स को दिए गए एक इंटरव्यू में कोहे पैमा (पर्वतारोही) लेशानूनीन ने बताया, वो और उनके एक साथी कोह पैमा, जो अस्टाकजी ग्लेशीयर की सैर कर रहे थे, ने सबसे पहले एक पत्थर पर रंग बिरंगी चीजें देखी। हमें इस बात पर ताअज्जुब हुआ कि वहां कोई मौजूद तो नहीं है। लापता होने वाले 27 साला शख़्स की शनाख़्त थॉमस फ्लेम के नाम से हुई, जो अगस्त 1990 में उस वक़्त लापता हो गए, जब वो एल्पस में कई दिन के पहाड़ी दौरे पर अकेले सफर पर निकले थे। वो मगरिबी यूरोप की बलंद तरीन चोटी मोंट ब्लैंक के पहाड़ी कस्बे चीमोंकिस से रवाना हुए थे।