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डाक्टर अमीर की किताब ‘हिन्दोस्तान उर्दू शायरी के हवाले से’ की रस्म इजरा

शाइरों की नजर से हिन्दोस्तान को समझना आसान और जरूरी भी मुकर्ररीन

नई दिल्ली : आईएनएस, इंडिया 

हिन्दोस्तान जमीन का एक टुकड़ा ही नहीं, एक ऐसा राष्ट्र है जिसकी दुनिया में कोई मिसाल नहीं मिलती। इस सरजमीन पर जितने मजाहिब और तहजीबियों ने परवान पाया है, वो एक तारीख है। ये बातें खुसरो फाउंडेशन के जेर-ए-एहतिमाम इंडिया इस्लामिक कल्चरल सेंटर में मुनाकिद रस्मे इजरा तकरीब में डाक्टर अमीर मंजर की मुरत्तिब करदा किताब 'हिन्दोस्तान उर्दू शायरी के हवाले से’ की रस्म रूनुमाई के दौरान कही गई। इस तकरीब में मुल्क की मुमताज उर्दू शख्सियात ने हिस्सा लिया और खुसरो फाउंडेशन की इस पहल को सराहा। 

वहीं अमीर मंजर की मेहनत का एतराफ किया जिन्होंने इस किताब में शाइरों की नजर से हिन्दोस्तान को कैद करने की भरपूर कोशिश की और कामयाब भी रहे। किताब की सबसे बड़ी और अहम खूबी उसके इंतिसाब में नजर आती है। किताब का इंतिसाब जश्न-ए-बहार ट्रस्ट की बानी और सरबराह कामना प्रसाद और जश्ने अदब के बानी कँुवर रणजीत चौहान के नाम है। दो गैर मुस्लिम शख्सियात जिन्होंने मादरी जबान ना होते हुए भी उर्दू को मुल्क में एक नई जिंदगी देने की जद्द-ओ-जहद को तहरीक बनाया और ये साबित किया कि उर्दू हो या हिन्दी, जबान कोई भी हो, उस का कोई मजहब नहीं होता। तकरीब की सदारात करते हुए कुँवर रणजीत सिंह ने खुसरो फाउंडेशन का शुक्रिया अदा किया। मेहमाने खुसूसी कौमी काउंसिल बराए फरोग उर्दू जबान के डायरेक्टर प्रोफेसर शेख अकील अहमद थे। 

इंडिया इस्लामिक कल्चरल सेंटर में मुनाकिद इस महफिल में हर किसी ने शाइरों की नजर से हिन्दोस्तान को देखने और समझने पर जोर दिया और कहा कि आज के हिन्दोस्तान में ये वक़्त की जरूरत है कि हम मुल्क की रवायात-ओ-इकदार की पासबाँ बनें। अपनी खूबसूरत तहजीब को जिंदा रखें जो हमें मिल-जुलकर और मेल मुहब्बत से जिंदगी गुजारने का सबक देती रही है और हमें दुनिया में एक मुनफरद मुकाम दिलाती है। खुसरो फाउंडेशन के चेयरमैन प्रोफेसर अखतर उल वासी ने अपनी इस्तकबालिया तकरीर में कहा कि हम चाहते हैं कि मुल्क के मौजूदा माहौल में ये कोशिश मिठास घोल दे, सोच बदल दे और हमें अपने माजी को याद करने पर मजबूर कर दे। उन्होंने कहा कि खुसरो फाउंडेशन ने रोज-ए-अव्वल से यही कोशिश की है कि मुल्क की फिरकावाराना खूबसूरती को उजागर किया जाए और अपने कौमी असासा की हिफाजत की जाए। 

उन्होंने कहा कि इस किताब के मुरत्तिब अजीजम अमीर मंजर ने जामिआ मिलिया इस्लामीया के शोबा उर्दू से डाक्टरेट की डिग्री हासिल की है। शायरी का मुताला उनका खास मैदान है। साहिब किताब अमीर मंजर ने अपनी तकरीर में कहा कि उर्दू शायरी का एहसान है कि उसने हमें ना सिर्फ हिन्दोस्तान बल्कि ना जाने कितने मौजूआत को समझने का मौका दिया है। जैसे लखनऊ की तहजीब को हम मर्सियों से दरयाफत कर सकते हैं या समझ सकते हैं। इसी तरह अगर कोई उर्दू शायरी का मुताला करे तो ना सिर्फ सरजमीन बल्कि अहम शख्सियात से मौसम और तहजीब तक सब कुछ मिल जाएगा। हमे उन खूबीयों का एहसास होगा जिनकी जानिब हमारी तवज्जा नहीं जाती। ये शायरी है, जो हमें इससे मुतआरिफ या वाकिफ कराती है।

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