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पत्रकारिता और हिंदी के बहाने उठे कई सवाल


हिंदी दिवस पर विशेष 

- शहरोज कमर : रांची 

भाषा महज अभिव्यक्ति का माध्यम ही नहीं होती, उसके साथ संस्कार, सरोकार, स्मृतियां और विचार भी सा­ाा होते हैं। भाषा की भी राजनीति होती है और राजनीति में भी भाषा होती है। भाषा सिर्फ क्षेत्र विशेष तय नहीं करती, अमीर-गरीब की शिनाख़्त भी कराती है। पत्रकारिता और हिंदी पर जब बात करने विगत दिनों रांची प्रेस क्लब में लेखक, पत्रकार, संस्कृतिकर्मी, डॉक्टर, इंजीनियर, कामगार और स्टूडेंट्स इकट्ठा हुए तो उक्त सारी खिड़कियां खुलीं और मूल स्वर यही निकला कि ‘जरा आने तो दो ठंडी हवा।’ 

‘हिंदी हैं हम...’ नारे के साथ प्रेस क्लब, रांची की इस पहल में दिल्ली से आए एनडीटीवी के संपादक व लेखक प्रियदर्शन ने विषय को कई कोण से समझाया। उन्होंने कहा कि भाषा सरोकार से बनती है। विचार और भाषा साझा करना चाहिए। देश में 43 करोड़ लोग तो होंगे, जिनकी मातृभाषा हिंदी है। जबरदस्ती भाषा थोपी नहीं जानी चाहिये। सहज ढंग से आए तो उत्तम। भाषा की हैसियत राजनीतिक ताकत से तय होती है। आज भी अंग्रेजी को विशेषाधिकार हासिल है। सरकारी तंत्र भी अंग्रेजी में काम कर रहा है। पत्रकारिता में सिर्फ हिंदी का रुदन ही नहीं किया, स्पष्ट बोले कि पत्रकारिता में गिरावट आई है। वहीं सोशल माध्यमों में इमोजी ने भावना की जगह ले ली है। चुप्पी और अंतराल की जगह नष्ट हो रही है।

‘मी बोरीशाइल्ला’ और ‘मरंग घोड़ा नील कंठ हुआ’ जैसे उपन्यास के सबब हिंदी पटल पर धूमकेतु बनीं डॉ. महुआ माजी का लेखन सम्प्रति स्थगित सा दीखता अवश्य है, लेकिन उनका सामाजिक अध्ययन और उनका अनुभव राजनीति में पहुंच मुखर हो रहा है। पिछले ही महीने राज्यसभा के लिए निर्वाचित हुई हैं। हिंदी के मार्फत उनकी भी पकड़ वर्तमान नब्ज पर रही। संगोष्ठी में बतौर मुख्य अतिथि उन्होंने कहा कि हिंदी राजभाषा है, लेकिन जिस प्रकार से देश में यह संपर्क भाषा बनकर उभरी है, उसे लगभग राष्ट्रीय भाषा का दर्जा हासिल हो चुका है। कहा कि कभी डॉ. रामदयाल मुंडा ने झारखंड के लिए सादरी को संपर्क भाषा बनाने की बात कही थी, यही स्थिति देश में हिंदी की है। लगभग 28 बोली, भाषा के सहकार से हिंदी बनी है और इसके ठाट की यही वजह है। अपनी भाषा को लेकर प्रेम सहज प्रवृत्ति है।

पत्रकार निलय सिंह के संचालन में शुरू गोष्ठी में स्वागत वक्तव्य क्लब के पूर्व महासचिव व न्यूज विंग के संपादक शम्भूनाथ चौधरी  ने दिया। उनका भी कहना यही रहा कि हिंदी में दूसरी भाषा के शब्दों से परहेज नहीं करना चाहिए। लेकिन इसके लिए जबरदस्ती न करें। मीडिया में आई खबरों के मुताबिक कार्यक्रम को हमारे आलेख पाठ क्रम से मिला। जिसमें हमारा मन्तव्य रहा कि उदंत मार्तण्ड से मौजूदा डिजिटल समय तक पत्रकारिता में हिंदी बहुत बदली है और बदलना भी चाहिए। भाषा को नदी की तरह होना चाहिए और आगे बढ़ना चाहिए। 

अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए क्लब के अध्यक्ष व प्रभात खबर के संपादक संजय मिश्रा ने बढ़ती हिंदी की ताकत और बाजार में इसकी उपादेयता की बात कही। सेंट्रल यूनिवर्सिटी झारखंड के देवव्रत ने हिंदी को तकनीक से जोड़ने पर बल दिया। इनके अलावा डॉ. आकांक्षा चौधरी ने कहा कि भाषा संवाद का माध्यम है। भाषा परिवर्तनशील है। आम आदमी पार्टी की प्रदेश प्रवक्ता यास्मीन लाल ने हिंदी के प्रति सरकारी उपेक्षा का प्रश्न उठाया। जबकि कवयित्री अनुराधा सिंह ने हिंदी पर केंद्रित कविता सुनाई। कई प्रश्न भी सामने आए, जिसके समाधान की कोशिश मंच से हुई। प्रेस क्लब की ओर से अतिथियों को पौधे और मोमेंटो देकर सम्मानित किया गया। मौके पर क्लब के कोषाध्यक्ष सुशील सिंह मंटू, कार्यकारिणी सदस्य रूपम, माणिक बोस, संजय रंजन, राकेश कुमार, परवेज कुरेशी, राज वर्मा के अलावा पूर्व अध्यक्ष राजेश सिंह, पूर्व महासचिव अभिषेक सिंह, असित कुमार, संध्या चौधरी, सुधीर पाल, नौशाद आलम, सरफराज कुरैशी,  डॉ. रूपा, महिमा सिंह, अमजद अहमद, शाहिद रहमान, असगर खान और चंदन भट्टाचार्य समेत कई हिंदी प्रेमी के अलावा बड़ी संख्या में मास कॉम के स्टूडेंट्स ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। 


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