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कुतुबमीनार तनाजा साकेत कोर्ट में अदालती फैसला महफूज

Masjid Kuvvatul, Kutub  minar

नई दिल्ली : आईएनएस, इंडिया 

दिल्ली की एक अदालत ने पीर को कुतुबमीनार काम्पलैक्स में मुबय्यना (कथित) मंदिरों की बहाली के लिए दायर अपीलों पर मुदाखिलत की अर्जी पर फैसला महफूज कर लिया है। 

गौरतलब है कि कुँवर महेंद्र ध्वज प्रसाद सिंह नामी शख़्स की तरफ से याचिका दायर कर आगरा, मेरठ, अलीगढ़, बुलंदशहर और गुड़गांव के गंगा और यमुना नद्दियों के दरमियान के इलाकों पर हुकूक मांगे गए हैं। अदालत ने मुदाखिलतकार की तरफ से पेश होने वाले एडवोकेट मनोहर लाल शर्मा, आरक्योलोजीकल सर्वे आफ इंडिया (एएसआई) की तरफ से पेश होने वाले एडवोकेट सुभाष गुप्ता और अपील कुनिंदा की तरफ से पेश होने वाले वकील की समाअत के बाद फैसला महफूज कर लिया है। 

एएसआई ने दलील दी है कि मुदाखिलत की दरखास्त को इस बुनियाद पर खारिज कर दिया जाएगा कि सिंह ने अपील में खासतौर पर किसी हक का दावा नहीं किया है और उसे फरीक बनने का कोई हक नहीं है। एएसआई ने दलील दी कि सिंह ने कई रियास्तों में फैले वसीअ इलाकों पर हुकूक का दावा किया था, ताहम, गुजिश्ता 150 सालों से किसी भी अदालत के सामने कोई मसला उठाए बगैर बेकार बैठे थे। एएसआई ने दावा किया कि गुजिश्ता साल दिल्ली हाईकोर्ट ने सुल्ताना बेगम नामी खातून की तरफ से लाल किला पर कबजे के लिए दायर की गई इसी तरह की दरखास्त को खारिज कर दिया था। दरखास्त गुजार ने खुद को आखिरी मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर दोम के पोते की बेवा बताया था। उनकी दरखास्त अदालत से रुजू करने में गैरमामूली ताखीर की बुनियाद पर खारिज कर दी गई। दरखास्त में कहा गया कि बर्तानवी हिन्दोस्तान और रियासतें 1947 में आजाद हुए। तब राजा रोहिणी रमन ध्वज प्रसाद सिंह बीसवें गैर मुनकसिम (अविभाजित) रियासत के हुकमरान थे, जिसमें बीसवाँ स्टेट, हाथरस स्टेट और वृन्दाबन स्टेट शामिल थे। ये मेरठ से आगरा तक फैला हुआ था। 1950 में राजा रोहिणी रमन ध्वज की मौत के बाद, जायदाद उनके कानूनी विरसा यानी 4 बेटे और बेवाओं (दरखास्त गुजार) समेत को विरासत में मिली।

1695 से आबाई जमीन और जायदाद बीसवाँ खानदान के पास रही। दरखास्त गुजार ने दावा किया कि 1947 में हिन्दोस्तान की आजादी के बाद हकूमत-ए-हिन्द ने बीसवाँ की ना-काबिल-ए-तक़्सीम रियासत बीसवाँ के साथ इंजिÞमाम का कोई मुआहिदा नहीं किया। ये दावा किया गया है कि हुसूल का कोई अमल नहीं हुआ था, लिहाजा बीसवाँ ना-काबिल-ए-तक़्सीम रियासत आज तक बीसवाँ खानदान के पास है। दरखास्त गुजार ने कहा है कि मर्कजी हुकूमत, हुकूमत दिल्ली और हुकूमत उतर प्रदेश ने कानून की मुनासिब कार्रवाई के बगैर दरखास्त गुजार के कानूनी हुकूक को पामाल किया है। ताहम तनाजा (विवाद) का मर्कज कुतुबमीनार है जो मजकूरा दायरा इखतियार में वाके है। मौकिफ इखतियार किया गया कि इस मुआमले में किसी भी फैसले से दरखास्त गुजार के कानूनी हुकूक को नुक़्सान पहुँचेगा। असल मुकद्दमा में मदईआन ने इल्जाम लगाया कि मस्जिद तकरीबन 27 हिंदू और जैन मंदिरों को मुनहदिम (ढहा) कर के बनाई गई है। सिविल जज ने ताहम इस मुकद्दमे को ये कहते हुए मुस्तर्द कर दिया कि मुकद्दमे को इबादत-गाहों के एक्ट 1991 की दफआत के तहत और कोड आफ सिविल प्रोसीजर आर्डर 7 रोल 11 के तहत कार्रवाई की वजह जाहिर ना करने पर रोक दिया गया था। दरखास्त खारिज कर दी गई। सिविल जज ने ये भी कहा था कि माजी की गलतीयां मौजूदा अमन को खराब करने की बुनियाद नहीं बन सकतीं और अगर इजाजत दी गई तो आईन के ताने-बाने, सैकूलर किरदार को नुक़्सान पहुंचाएंगे।


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