तिरुअनंतपुरम : आईएनएस, इंडिया
एक जमाने में अंग्रेजी जबान को हिन्दोस्तान में शजर-ए-मम्नूआ समझा जाता था, यहां तक कि बाअज दानिश्वर (विद्वान) और रहनुमा अंग्रेजी जबान सीखने से मना करते थे। मुस्लमानों के मजहबी रहनुमाओं ने भी अंग्रेजी तालीम से समाज को रोकने की कोशिश की थी। उस वक़्त रियासत केराला में एक अनोखा वाकिया हुआ, जब एक मुस्लिम लड़की ने अंग्रेजी तालीम हासिल की और तमाम मुखालफतों का मुकाबला जिÞंदादिली के साथ किया और अंग्रेजी सीखने के बाद दीगर मुस्लिम खवातीन के लिए मिशअल-ए-राह बनीं।
रियासत केराला में अंग्रेजी तालीम हासिल करने वाली पहली मुस्लमान खातून मालेकल मारियो मम्मा का 5अगस्त 2022 बरोज जुमा को किन्नौर जिÞला के थलासरी में इंतिकाल हो गया। वो 95 साल की थीं। इसमें शक नहीं कि वो केराला के मुस्लमानों में अंग्रेजी तालीम की एक अलामत समझी जाती थीं, बल्कि नई नसलों के लिए एक तहरीक बनी रहीं। मारियो मम्मा की मौत पर ताजियत करते हुए रियासत केराला के वजीर-ए-आला ने कहा कि हमने एक ऐसी शख़्सियत को खो दिया है, जिन्होंने थलासरी की तारीख के साथ-साथ अपने अनमिट नक़्श छोड़े हैं। कदामत पसंदी की रुकावटों को बर्दाश्त करते हुए, उन्होंने अंग्रेजी सीखी और दूसरों के लिए रहनुमाई का सामान फराहम किया। वजीर-ए-आला ने मजीद कहा कि मारियो मम्मा ने मुस्लिम लड़कीयों के तालीमी हुकूक के लिए जद्द-ओ-जहद की। वो हमेशा एक तरक़्की पसंद चेहरा और मजहबी हम-आहंगी की अलामत भी बनी रहीं। उनकी मौत ने एक नसल और एक खित्ता को गमगीं बना दिया। सन 1927 में पैदा होने वाली, मारियो मम्मा का ताल्लुक थलासरी के एक मुमताज मुस्लिम खानदान से था। प्राइमरी तालीम मुकम्मल करने के बाद उन्होंने मजीद तालीम के लिए थलासरी के सेकर्ड हार्ट कॉन्वेंट स्कूल में दाखिला लिया। वे 1886 में कायम होने वाले स्कूल में 200 तलबा में से वाहिद मुस्लमान लड़की थी। उन्होंने पांचवीं जमात में अंग्रेजी हरूफ-ए-तहज्जी की तालीम हासिल की। मारियो मम्मा की मां स्कूल टीचर थीं। उन्होंने उन्हें अंग्रेजी सीखने में मदद की। अगरचे मुस्लिम कम्यूनिटी ने मारियो मम्मा को बहुत बुरा-भला कहा, जो बुर्क़ा पहन कर अंग्रेजी पढ़ने स्कूल जाती थीं। उन्हें अपनी बिरादरी की तरफ से तौहीन का सामना करना पड़ा लेकिन उनके वालिद ओवी अब्दुल्लाह ने उनकी बहुत मदद की, अगरचे वो एक मजहबी स्कालर थे। उन्होंने बेटी की अंग्रेजी तालीम जारी रखने में मदद की। उनके वालिद अब्दुल्लाह ने सिर्फ दूसरी जमात तक तालीम हासिल की थी, लेकिन वो अंग्रेजी में लिखना पढ़ना जानते थे। मारियो मम्मा ने 1943 तक कान्वेंट की तालीम जारी रखी, दसवीं जमात तक तालीम हासिल करने के बाद उनकी शादी हो गई। उनकी तरगीब से ना सिर्फ मुकामी मुस्लिम लड़कीयों और खवातीन ने अंग्रेजी सीखनी शुरू की बल्कि दूर दराज के इलाके के लोगों ने भी अंग्रेजी जबान को अपनी तर्जीहात में शामिल कर लिया था।