बेकसूर उस्ताद की गिरफ्तारी और नौ साल बाद बेकसूर साबित होकर अदालत से ब इज्जत रिहा होने के दौरान वाहिद के परिवार के बिखराव और मजहब को लेकर कुंद जहन पुलिसिया तशद्दुद पर फोकस्ड फिल्म में अहम किरदार रायपुर (छत्तीसगढ़) के डाक्टर रियाज अनवर ने निभाया है।

उर्दू में अपनी लिखी किताब 'बेगुनाह कैदी' पकड़े हुए ओरिजनल वाहिद
और कैदी की नाम पट्टिका पकड़े फिल्मी वाहिद यानि रायपुर के डॉ. रियाज अनवर
फिल्मी जायजा : मुहम्मद जाकिर हुसैन
इंतेजामिया की चपेट में आए एक आम आदमी और पेशे से उस्ताद (शिक्षक) वाहिद शेख की आपबीती को हिदायतकार सुदर्शन गमारे ने ‘हिमोलिम्फ-द इनविजिबल ब्लड’ फिल्म के जरिए दुनिया को दिखाया है।
खुशमिस्मती से मुझे यह फिल्म देखने का मौका मिला। और सच यह है कि फिल्म खत्म होने के बाद भी सीट से उठने की मेरी हिम्मत नहीं हुई। जिस बेरहमी के साथ हिदायतकार और उनकी टीम ने हकीकत बयां की है, वह बड़ी दीदा दिलेरी का काम है।
कहानी, उस्ताद वाहिद शेख की है जिसे मुंबई में 11 जुलाई 2006 को हुए बम धमाके के मुल्जमीन के तौर पर पुलिस ने गिरफ़तार किया था। धमाके में 200 से जायद लोगों की हलाकत हुई थी। कहानी, महज उस्ताद वाहिद शेख की गिरफ्तारी और धमाके में हलाक होने वालों की नहीं थी, अलबत्ता गिरफ्तारी के बाद वाहिद और उनके परिवार को जिस तशद्दुद (प्रताड़ना) का सामना करना पड़ा था, उसके इर्द-गिर्द घूमती है। इस बीच वाहिद के वालिद गुजर जाते हैं, सदमें में बड़े भाई का दिमागी तवाजुन (मानसिक संतुलन) बिगड़ जाता है और वालिदा को लगातार दौरे आने लगते हैं। गरज ये कि वाहिद की गिरफ्तारी से पूरा परिवार टूट जाता है।
इसके बावजूद वाहिद हिम्मत नहीं हारते और सब्र से काम लेते हैं। जेल में रहते हुए वाहिद अपनी पढ़ाई जारी रखते हैं। सहाफत (पत्रकारिता) में डिग्री लेते हैं और बाद में कानून की भी पढ़ाई करते हैं। आखिरकार 9 साल बाद उन्हें इंसाफ मिलता है। अदालत में वे बेगुनाह साबित होकर रिहा होते हैं।
रिहाई के बाद वाहिद का इंटरव्यू कई चैनलों ने लिया, जिसके वीडियो यू-ट्यूब पर मौजूद हैं। जिन्होंने मनीषा भल्ला और डाक्टर अलीमुल्लाह खान की ‘ब इज्जत बरी’ या फिर खुद वाहिद शेख की लिखी ‘बेगुनाह कैदी’ पढ़ी हो, वो इस फिल्म की संजीदगी को ज्यादा बेहतर ढंग से समझ सकते हैं।
हिदायतकार सुदर्शन गमारे ने अपनी फिल्म का नाम इतना अबूझ सा क्यों रखा..? यह सवाल मेरे जैसे शायकीन (दर्शक, प्रशंसक) के मन में फितरी (स्वाभाविक) तौर पर आएगा ही। मेरी समझ से तो बैनुल अकवामी (अंतरराष्ट्रीय) पहुंच के लिए ऐसा नाम रखा गया है। मैं, हिदायतकार गमारे का इंटरव्यू देख रहा था, जिसमें वे बताते हैं कि चींटी को मसल दिया जाए तो मौत के बावजूद उसका खून नजर नहीं आता। यही नजर नहीं आने वाला खून ‘हिमोलिम्फ’ कहलाता है।
कुछ ऐसी ही हकीकत हमारे मुल्क के आम लोगों की है, जिसमें दलित, मुसलमान और दीगर महरूम (वंचित) तबके के लोग इंतेजामिया के शिकार होकर पिस जाते हैं, उनका पूरा परिवार बरबाद हो जाता है। इसके बावजूद ऐसे लोगों का यह खून नजर नहीं आता है।
पूरी फिल्म मुंबई बम ब्लास्ट के बाद के (तकरीबात) घटनाक्रम के इर्द-गिर्द घूमती है। जो पेशे से उस्ताद वाहिद शेख और उनके घर के हालात पर फोकस्ड है। फिल्म में वाहिद शेख का किरदार रायपुर के डॉ. रियाज अनवर ने निभाई है। डॉ. रियाज के बारे में हालांकि फिलहाल ज्यादा जानकारी नहीं है, लेकिन फिल्म में अपने किरदार से उन्होंने पूरा इंसाफ किया है और एक तरह से उन्होंने वाहिद शेख को जीया है।
शायद पहली बार किसी फिल्म में आर्थर रोड जेल की अंडा सेल का मंजर इतने तफ़्सील के साथ दिखाया गया है। हालांकि जेल के अंदर के कुछ मंजर बनावटी से भी लगे। एक संजीदा फिल्म को पूरी संजीदगी से पेश करने में हिदायतकार ने थोड़ी कसर भी छोड़ी है। हालांकि, एक संजीदा कहानी का ‘फिल्मीकरण’ करने के लिए हिदायतकार ने फिल्म में एक कव्वाली भी शामिल की है। फिल्म में कई जगह मराठी और अंग्रेजी में (मकालमे) संवाद हैं। बेहतर होता, हिदायतकार इन मकालमों के दौरान सबटाइटल दे देते।
कुल मिला कर यह फिल्म पूरी संजीदागी के साथ एक जरूरी मुद्दे पर हमारे दिमाग को खौलाती है। लगता है, जैसे कोई डाक्टर किसी नासूर पर चीरा लगा रहा हो। फिल्म को सिनेमाहॉल में देखने के दौरान मुझे समाज में बढ़ती सड़ांध भी सुनाई दी। फिल्म में जहां मुल्जिम वाहिद पर टार्चर के दौरान पुलिस वाले उसके मजहब को लेकर गालियों की बौछार कर रहे थे, या फिर ताने दे रहे थे, कुछ सामईन (दर्शकों) के मुंह से निकलने वाले ठहाकों की आवाज उन्हें मिलने वाली रूहानी खुशी (आत्मिक सुख) का अहसास करा रहे थे।
खैर, ऐसे सामईन के लिए यह फिल्म है ही नहीं। आप अगर इस केटेगरी के सामईन के जमरे (श्रेणी) में खुद को नहीं रखते हैं तो एक बार यह फिल्म जरूर देख आएं। आपकी रगों में बहता खून ठंडा न हो जाए तो कहना।
करीब 175 साल पहले दिल्ली की बल्लीमारान की गलियों में एक बूढ़े शायर ने लिखा था-
‘रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं कायल, जब आंख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है।’
(आप उस बूढ़े शायर, जिन्हें लोग चचा गालिब के नाम से जानते हैं, जानते ही होंगे)
बहरहाल, हिदायतकार ने अपनी फिल्म का नाम ‘अदृश्य लहू’ रखा है, जबकि फिल्म देखते हुए मुझे महसूस हो रहा था, गोया यह आंख से टपकता गर्म लहू है, जिसे बहता हुआ देख कर भी हम सब खामोश हैं....
- भिलाई, मोबाईल : 9425558442