कमर रईस साहिब की पैदाइश 12 जुलाई 1932 में शाहजहांपुर में हुई। उन्होंने लखनऊ यूनीवर्सिटी से एमए और एलएलबी किया और फिर अलीगढ़ मुस्लिम यूनीवर्सिटी से 1959 में पीएचडी की डिग्री हासिल की। इसी साल वो दिल्ली यूनीवर्सिटी में शोबा उर्दू में लेक्चरर हुए और फिर रीडर, प्रोफेसर और सदर शोबा बने। उन्होंने दिल्ली यूनीवर्सिटी में विजिटिंग प्रोफेसर की हैसियत से भी खिदमात अंजाम दीं। वे तरक़्की पसंद अदीबों में एक नुमायां मुकाम रखते थे और कम-ओ-बेश दो दर्जन कुतुब के मुसन्निफ भी थे। उनका बुनियादी काम प्रेमचंद पर था। वे तीन साल तक दिल्ली उर्दू एकेडमी के वाइस चेयरमैन रहे। उन्होंने ना सिर्फ तरक़्की पसंद अदीब बल्कि उर्दू के खादिम की हैसियत से भी काफी नाम कमाया। प्रोफेसर कमर ताशकंद में पाँच साल तक इंडियन कल्चरल सेंटर के डायरेक्टर भी रहे। इसके अलावा पांच बार अंजुमन असातिजा उर्दू जमिआत के जनरल सेक्रेटरी और उर्दू के पहले प्रोफेसर थे जिन्हें यूजीसी ने नेशनल लैक्चरार के एजाज से नवाजा था। इसके अलावा 2001 में ताशकंद यूनीवर्सिटी ने उन्हें पीएचडी की डिग्री तफवीज की थी।
प्रोफेसर कमर के इंतिकाल से ना सिर्फ तरक़्की पसंद अदब के एक अह्द का खातमा हो गया बल्कि दिल्ली की इल्म-ओ-अदब की फिजा भी सूनी हो गई है। वे मुख़्तसर अलालत के बाद 29 अप्रैल 2009 को 77 साल की उम्र में दिल्ली में इंतिकाल कर गए। उनकी कोशिशों की बदौलत हाल ही में दिल्ली में उर्दू के 28 असातिजा की तकरुर्री को मुस्तकिल किया गया था। उन्होंने 18 साल तक अंजुमन तरक़्की पसंद मुसन्निफीन के जनरल सेक्रेटरी की हैसियत से भी खिदमात अंजाम दीं। दिल्ली उर्दू एकेडमी के वाइस चेयरमैन की हैसियत से साबिक मेंबर पार्लियामेंट और तुर्कमानिस्तान में हिंद के मौजूदा सफीर मीम अफजल के बाद उर्दू एकेडमी को सरगर्म करने में सबसे नुमायां रोल अदा किया था।
प्रोफेसर कमर तरक़्की पसंदी के सुनहरे दौर की यादगार थे और तरक़्की पसंदों के हरअव्वल दस्ते के सरगर्म रुकन भी थे। कमर रईस ने अली सरदार जाफरी के बाद तरक़्की पसंद तहरीक के लिए तारीखी खिदमात अंजाम दीं। दिल्ली उर्दू एकेडमी में उनकी खिदमात तारीखी नौईयत की रहीं। कमर रईस तरक़्की पसंदी से वाबस्तगी के बावजूद इंतिहापसंदी से हमेशा दूर रहे और तरक़्की पसंद अफसानवी के अव्वलीन मजमुए 'अँगारे पर एतराज के जरीये उन्होंने उसका अमली मुजाहरा किया था, जिसमें बाअज इस्लामी रवायात पर तन्कीद उनके नजदीक काबिल-ए-ताईद नहीं थी। उन्होंने बैरून-ए-मुल्क तक उर्दू की तरवीज-ओ-तरक़्की में भी अहम रोल अदा किया था। ताशकंद में इंडियन कल्चरल सेँटर के डायरेक्टर की हैसियत से उनकी खिदमात नाकाबिल फरामोश हैं।
उन्होंने तलबा की एक नस्ल को नजरियाती तर्बीयत देने का भी काम अंजाम दिया। उनकी सलाहीयत के मोतरिफ ना सिर्फ हिंद व पाक के दानिश्वर रहे बल्कि हुकूमत ताशकंद ने भी आपकी गिरां कदर खिदमात के लिए आपको एजाज से सरफराज किया था। मुंशी प्रेमचंद पर उनका काम बुनियादी एहमीयत का हामिल है। कुछ अरसा कब्ल कमर रईस की शायरी का मजमूआ भी मंजर-ए-आम पर आया था जो उर्दू नज्म के सरमाये में एक काबिल-ए-कदर इजाफा है। वो सिर्फ़ अदीब ही नहीं बल्कि समाजी मुसल्लेह भी थे और बतौर अदबी स्फार तक उनकी निहायत गैरमामूली खिदमात थीं। उन्होंने बैन-उल-अकवामी सतह पर उर्दू को पहुंचाया और आज पूरी दुनिया में हमारी जबान की धूम है।
कमर रईस यानि एक ऐसी शख़्सियत जिन्होंने मुल्क और बैरूंने मुल्क में उर्दू को पहचान दिलाई और उर्दू जबान की बका व फरोग के लिए अपनी गिरां कदर खिदमात अंजाम दीं। ऐसी नायाब शख़्सियत को आज उर्दू दां और उर्दू हलका फरामोश कर चुकी है।
- एमडब्ल्यू अंसारी, (आईपीएस), (रिटा. डीजीपी)
अहमदाबाद पैलेस रोड, भोपाल
