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अजीम सहाफी, चंपारण सत्याग्रह के गुमनाम हीरो व मुजाहिद आजादी : मुहम्मद मूनिस

बर्तानवी दस्तावेज के मुताबिक वक्त के डेंजर जर्नलिस्ट रहे हैं मूनिस


मादर-ए-वतन के इस अजीम सपूत पीर मुहम्मद मूनिस को आज भुला दिया गया है। ये वो हस्ती हैं, जिन पर बड़ी से बड़ी किताबें लिखी जा सकती थीं, क्योंकि चंपारण सत्याग्रह का सहरा उनके ही सर जाता है, क्योंकि सबसे पहले चंपारण सत्याग्रह का मुद्दा उन्होंने ही उठाया, लेकिन अफसोस उनके नाम से लोग वाकिफ भी नहीं हैं। पीर मूनिस को बत्तख मियां अंसारी की तरह ही फरामोश कर दिया गया। आज मुल्कभर में गांधी जी के नाम से संस्थान (इदारे) बने हुए हैं जहां इन मुजाहिदीन आजादी, पीर मुहम्मद मूनिस फाउंडर आफ चंपारण सत्याग्रह और गांधी जी की जान बचाने वाले बख़्त मियां उर्फ बत्तख मियां अंसारी की तस्वीरें तक नहीं हैं।


- एमडब्ल्यू अंसारी (आईपीएस) (रिटा. डीजीपी) 

चंपारण सत्याग्रह भारत की जद्द-ओ-जहद आजादी में एक नाकाबिल फरामोश संगे मील है। 20 वीं सदी के इबतिदाई सालों में बर्तानवी पालिसीयों की वजह से किसान मुतास्सिर हो रहे थे और बिहार के चंपारण इलाके में हालात नाकाबिल-ए-बर्दाश्त हो चुके थे। सन 1917 में महात्मा गांधी ने अपना पहला सत्याग्रह शुरू करने का फैसला किया, जिसने आजादी की जद्द-ओ-जहद के ढाँचे को नुमायां तौर पर तबदील कर दिया। आजादी के लिए लड़ने का अज्म करने वाले हजारों मुकामी लोगों में पीर मुहम्मद मूनिस भी थे।

पीर मुहम्मद मूनिस ने अपनी पूरी जिंदगी अपनी कौम को बर्तानवी राज के चंगुल से आजाद कराने के लिए वक़्फ कर दी और उसके समाजी ताने-बाने को महफूज किया। उन्होंने भारत में हिंदू-मुस्लिम के दरमयान फिरकावाराना हम-आहंगी को बरकरार रखने का जिम्मा लिया। उनकी सहाफती जमालीयात उस वक़्त एक समाजी तहरीक का कारखाना बन गईं। मुहम्मद मूनिस 29 मई 1882 में गु़लामी के दौर में पैदा हुए, लेकिन उन्होंने इन्किलाब का रास्ता बचपन में ही चुन लिया था। आजादी के लिए उनका पसंदीदा हथियार कलम था। उन्होंने मुकामी किसानों के मसाइल को बहुत ही मजबूती के साथ उठाया जो बर्तानवी हुकूमत की बुनियादों को हिला कर रख दिया।

एक ऐसे वक़्त में जब शुमाली भारत में उर्दू, फारसी और अंग्रेजी बोली जाती थी, मूनिस ने एक मौकिफ इखतियार किया और उर्दू के साथ-साथ हिन्दी को एक मकबूल बोली जाने वाली और तहरीरी जबान बनाने के लिए सख़्त मेहनत की। वे अपने अज्म पर इस कदर डटे रहे कि अंग्रेज उनके मौकिफ (रूख) को बर्दाश्त ना कर सके जिसके नतीजे में उन्हें 'डेंजरस जर्नालिस्ट' करार दे दिया गया। बर्तानवी दस्तावेजात के मुताबिक 'पीर मुहम्मद मूनिस एक खतरनाक और बदमाश सहाफी हैं, जिन्होंने अपने काबिल एतराज लिटरेचर के जरीये बिहार के चंपारण जैसे पसमांदा मुकाम के लोगों की परेशानियों को उजागर किया और महात्मा गांधी को चंपारण जाने के लिए मुतास्सिर किया।

दिलचस्प बात ये है कि जिÞला चंपारण के आसपास के मुजाफात, खासतौर पर इंडिगो फैक्ट्री के करीब के मुकामात ने 1915 में ही अपने मसाइल पर आवाज उठाना शुरू कर दिया था। चुनांचे 1917 में गांधी जी की आमद से पहले ही इन्किलाब शुरू हो चुका था। इसकी तसदीक बिहार स्पेशल ब्रांच इन्टेलीजेंस की जानिब से 4 मार्च 1916 को शाइआ होने वाली एक रिपोर्ट से होती है, जिसमें कहा गया है कि दिहात में ये अफ़्वाह भी है कि गांधी, जिसने कभी जुनूबी अफ्रÞीका में भारतीयों को मुश्तइल किया था, यहां लैक्चर देने आ रहे हैं। ये बहस मूनिस के लिखे गए पाम्प्लेट का नतीजा थी। मूनिस साहिब का वो खत जिसके जरीये उन्होंने गांधी जी को वहां के मजदूरों के बुरे हालात और अंग्रेजों के जुलम व ज्यादती के बारे में लिख कर आगाह किया और वहां आने की दावत दी।

ये भी कहा जाता है कि गांधी जी ने चंपारण में हिन्दी सीखी थी और मूनिस ने इसमें कलीदी किरदार अदा किया था। वहां जाने से पहले गांधी जी सिर्फ अपनी मादरी जबान गुजराती और अंग्रेजी जानते थे और अपने तमाम इबतिदाई नोट अंग्रेजी में लेते थे। उसके बाद, जब जरूरत पेश आई, मूनिस ने इस बात को यकीनी बनाया कि गांधी जी हिन्दी सीखें और जब भी जरूरत हो उसे इस्तिमाल करें।

पीर मुहम्मद मूनिस एक मुकामी किसान राज कुमार शुक्ला और अपने करीबी दोस्त हरी वंश सहाय के साथ लखनऊ कान्फें्स में गए। चंपारण वापस आने के बाद पीर मूनिस ने राज कुमार शुक्ला के जरीये 27 फरवरी 1917 को गांधी जी को एक खत लिखा जिसका उन पर गहरा असर पड़ा। इससे चंपारण जाने के उनके इरादों को तकवियत मिली। पटना कॉलेज के प्रिंसिपल और मुअर्रिख केके दत्ता को ये खत मूनिस के घर से मिला।

इसके बाद, 22 मार्च,1917 को, पीर मुहम्मद मूनिस ने खुद गांधी जी को एक खत लिखा, जिसमें उन्होंने चंपारण के हवाले से कई अहम सवालात उठाए। उस खत के जवाब में गांधी जी ने पूछा कि वो मुजफ़्फरपूर कैसे जा सकते हैं और क्या चंपारण में उनके तीन दिन कियाम का इंतिजाम किया जा सकता है।

जब गांधी जी अंग्रेजों के खिलाफ जद्द-ओ-जहद शुरू करने के लिए चंपारण पहुंचे तो पीर मुहम्मद मूनिस पूरे सफर में उनके साथ रहे। उन्होंने गांधी जी के लिए खाना पकाया और पूरे दिल से उनकी खिदमत की। जब बर्तानवी हुकूमत ने गांधी की मदद करने वाले 32 अफराद की फेहरिस्त तैयार की तो दसवां नाम पीर मूनिस का था। अंग्रेज मूनिस को गांधी के एक बड़े इत्तिहादी के तौर पर पहचानने लगे।

ये बात काबिल-ए-गौर है कि डब्ल्यूएच लुईस को मालूम नहीं था कि प्रताप कानपूर में मुकीम अखबार था ना की लखनऊ में। मूनिस बतियाराज स्कूल के उस्ताद नहीं थे बल्कि वो गुरु ट्रेनिंग स्कूल में पढ़ाते थे। वो तबदीलशूदा मुस्लमान नहीं थे बल्कि वो पैदाइशी मुस्लमान थे। तरहोत डवीजन के कमिशनर ने मई 1917 में एक रिपोर्ट भेजी जिसमें वाजिह तौर पर कहा गया कि 'दो अफराद पार्टी की बहुत मदद कर रहे हैं, और बहुत सा मवाद फराहम कर रहे हैं, यानी एक पीर मुहम्मद मूनिस जो तमाम मजामीन को कागज पर सबस्क्राइब करते हैं।' प्रताप आफ काउनपूर' जिसने ममनूआ पांप्लेट 'चंपारण के प्रजा पर अत्याचार' लिखा। दूसरे एक दीगर शख़्स थे।

गांधी जी पहली बार 22 अप्रैल 1917 को बतिया गए थे। वो कुछ देर हजारी मिल धर्मशाला में रहे फिर पीर मुहम्मद मूनिस की वालिदा से मिलने गए। मूनिस के हजारों दोस्त गांधी के इस्तिकबाल पर खुश थे। मूनिस ने खुद को मुजाहिद आजादी साबित किया था और अपनी पूरी जिंदगी जंग-ए-आजादी के लिए वक़्फ कर दी थी। गांधी जी भी मूनिस को दिल-ओ-जान से प्यार करते थे। दरहकीकत, ये मूनिस के इन्किलाबी अलफाज थे जिन्हों ने गांधी को चंपारण की तरफ खींचा था।

बनारसी दास चतुवेर्दी ने अपनी सवानेह उमरी में मूनिस के बारे में लिखा है, 'कौन इन जद्द-ओ-जहद की मुकम्मल कहानियां सुनाएगा जो मूनिस ने चंपारण के लिए की थीं'; वाजेह रहे कि मूनिस ने चंपारण की तरफ लोगों की तवज्जा दिलाने के लिए जितना काम किया है, किसी और मुसन्निफ ने नहीं किया।

गणेश शंकर विद्यार्थी ने मूनिस के इंतिकाल पर उन्हें खिराज-ए-अकीदत पेश करते हुए अपने अखबार प्रताप में लिखा, 'हमें इंतिहाई दुख है कि बतिया, चंपारण जिÞला के पीर मुहम्मद मूनिस का दिसंबर 1949 को इंतिकाल हो गया। हमें ऐसे जिÞंदा दिल इन्सान से मिलने और देखने का शरफ हासिल है जो अब खामोशी से एक तरफ लेटा हुआ है। दुनिया उनके मसाइल के बारे में कुछ नहीं जानती। 

उन्होंने मजीद लिखा कि 'आपने गांधी जी को चंपारण की खौफनाक कहानी सुनाई और ये आपकी मेहनत का नतीजा था कि महात्मा गांधी ने चंपारण का दौरा किया जिसने इस सरजमीन को एक मुकद्दस मुकाम बना दिया, वो मुकाम जो तारीख के सफहात में नाकाबिल-ए-तलाफी है।' 

हम तमाम भारतवासियों से अपील करते हैं कि भारत के इन अजीम सपूतों, जिन्होंने भारत को आजाद कराने और भारत की तरक़्की के लिए जिंदगी वक़्फ कर दी, उन्हें खराज-ए-अकीदत पेश किया जाए। देश प्रेम के उनके जज्बे से हमें सबक लेना चाहीए। 

किसी ने किया खूब कहा है-

‘हाल को मुस्तकबिल की खातिर जोड़ रखा है माजी से 

तीर को जितना पीछे खींचोगे, उतना आगे जाता है।’ 


बेनजीर अंसार एजूकेशनल एंड सोशल वेल्फेयर सोसाइटी

अहमदाबाद पैलेस रोड, भोपाल 


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