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कौन है... (कविता) गजेंद्र द्विवेदी ‘गिरीश’


 है बड़ी दुविधा कि सच्चा कौन, झूठा कौन है,

पूछती कलियां भ्रमर से, आज रूठा कौन है।।


बुझ गए दीपक भी सारे, केवल हृदय ही जल रहा,

भीड़ में रहकर भी मेरा, यह मौन मुझको खल रहा।


हरदम विफल प्रयत्न सारे, इस प्रश्न के हल बुझाने  

कि भाग्य लिखता जीत कैसे, हावी सदा जब कल रहा।।


जोड़ते कड़ियों को एकदिन फिर से टूटा कौन है, 

है बड़ी दुविधा कि सच्चा कौन, झूठा कौन है।

पूछती कलियां भ्रमर से, आज रूठा कौन है...


कलम व्यथित हो रही, कैसे करूँ मैं व्यवस्थित,

शांतिपथ पर दीखते हैं, व्यवधान सर्वदा उपस्थित।


दी टूटने सब डालियां, हम सभी ने रखे नेत्र भींचे 

रज में लगे है लोटने, जग में रहे थे जो प्रतिष्ठित।।


रंग सारे तन लगा, फिर बेरंग इसमें छूटा कौन है,

है बड़ी दुविधा कि सच्चा कौन, झूठा कौन है।


पूछती कलियां भ्रमर से... 


  • -गजेंद्र द्विवेदी ह्यगिरीशह्ण
  • भिलाई-3
  • 7000858588


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