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लोकतांत्रिक आस्था और साड़ी, धोती

 जब हम निहायत ही छोटे थे, इत्ते छोटे कि नाड़ा बांधना भी ठीक से नहीं आता था, अब्बु की ऊंगली पकड़कर नेताओं की सभा में जाया करते थे। अब्बु बड़े पे्रेक्टिकल आदमी थे। एकमात्र संतान होने के कारण वे हमें जितना लाड़ करते थे, उतना ही वे यह भी चाहते थे कि बड़ा होकर हम कोई ढंग का आदमी बनें। हमारे पास भी कार, बंगला, और नौकर-चाकर हों। इसलिए वे अक्सर हमें यहां-वहां ले जाया करते थे। ज्यादातर नेताओं की सभा में। वे शायद हमें नेता बनाना चाहते थे। वे चाहते थे कि हमारे पास भी कार, बंगला और नौकर-चाकर हों...।

लेकिन अल्लाह झूठ न बुलवाए (लिखवाए)। हमने न सिर्फ नाड़ा बांधना सीख लिया बल्कि नाड़ा बांधना सीख रहे तीन बच्चों के अब्बा भी बन गए, नेता बनना तो दूर, खालिस चम्मच भी न बन सके और आज तक उसी टूटी साईकिल पर अपनी जीर्ण-शीर्ण काया को ढो रहे हैं, जो अब्बु विरासत में छोड़ गए हैं। नेता बनने के निमित्त अगर हम अब्बु की एकमात्र नसीहत को ही आत्मसात कर लिए होते तो आज हमारी भी पांचों ऊंगलियां घी में और सिर कढ़ाई में होता। अब्बु कहते थे-वजीर बनने के लिए फकत वाकपटुता और चापलूसी चाहिए-बस। लेकिन हमसे वह भी न हुआ। 

बचपन में अब्बु की ऊंगली पकड़कर यहां-वहां जाने का हमें प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष बड़ा लाभ हुआ था। अब्बु बड़े पे्रक्टिकल आदमी थे। ब्लाक स्तर से लेकर शहर स्तर तक होने वाली पार्टी की हर सभा में टेंट की कुर्सियां कतार से लगाने और सभा के बाद कुर्सियों को गिनकर टेंट वाले के जिम्मे करने की महती जिम्मेदारी अब्बु ही निभाया करते थे। लाउडस्पीकर से एक-दो बार ठक-ठक और उसके बाद हैलो-हैलो...माईक टेस्टिंग...माईक टेस्टिंग की जो आवाज आती थी, वह अब्बु की आवाज होती थी। अब्बु इस बात को लेकर बड़े चौकस रहते थे कि कोई नेता कुछ बोल रहा हो तो बीच में माईक दगा न दे जाए इसलिए सभा से पहले वे माईक को अच्छी तरह टेस्ट कर लिया करते थे। अब्बू कहते थे-‘नेता के मुंह से निकला हर लफ्ज बड़ा कीमती होता है। नेता अपने मुंह की ही खाते हैं।’ पार्टी के प्रति अब्बु के इस समर्पण भाव से छोटे-बड़े सभी नेता अब्बु का बड़ा सम्मान करते थे जिसका सिला हमें भी मिला। नुक्कड़ के ठेले से पान, सिगरेट लाने और बिजली के खंबे पर चढ़कर बधाई वाले पोस्टर्स टांगने के लिए छुटभैय्ये नेताओं की हम पहली पसंद बन गए थे। छुटभैय्ये नेताओं को हमाए में अगला वार्ड अध्यक्ष बनने के आसार दिखाई देने लगे थे जिसका गाहे-ब-गाहे वे बखान भी किया करते थे। 

लेकिन उसी दौर में पता नहीं ऐसा क्या हुआ कि हमारा मन वितृष्णा से भर गया और हमने पूरी तरह राजनीति से किनारा ही कर लिया। राजनीति से हमारा यूं पलायन कर जाना राजनीतिक गलियारे में काफी दिनों तक चर्चा का विषय बना हुआ था। तरह-तरह की बातें हो रही थी। लोग कयास लगा रहे थे। कह रहे थे, ‘कहीं उसका स्वाभिमान तो नहीं जाग गया...सॉरी... कह रहे थे-कहीं उसकी अक्ल तो ठिकाने नहीं लग गई।’ 

जो भी हो, चुनाव के दौरान एक अदद नेता चुने जाने की प्रक्रिया देख लोकतंत्र के प्रति हम श्रद्धा से भरे हुए थे। शांसन तंत्र की सक्रियता और गंभीरता देख लग रहा था जैसे समुद्र की थाह से कोई मोती निकाली जानी है। हालांकि ऐन चुनाव से एक दिन पहले रात के समय महिलाओं को साड़ी और मर्दों को दारू बांटने का तात्पर्य हम अब तक नहीं समझ सके। हो सकता है, राजनीति से हमारी विरक्ति की यही वजह हो।

भाई मियां को जब पता चला तो बोले-‘तुम ठहरे निरे बेवकूफ। तुम अभी राजनीति का ककहरा सीखने के स्टेज में हो इसलिए तुम्हें मान, सम्मान, काम, क्रोध, दया, करुणा आदि विचारों को अपने आसपास फटकने भी नहीं देना चाहिए।’ 

‘जिसके लिए पूरा शासन तंत्र सक्रिय है। मतदाता अपना काम-धंधा छोड़, कड़ी धूप और लंबी कतार में लग कर अपने जिम्मेदार नागरिक होने का परिचय दे रहे हैं, वह शासन तंत्र की सक्रियता और नागरिकों की गंभीरता को दारू और दो टके की साड़ी-धोती से तौल रहा है। यह कैसी राजनीति है।’ 

भाई मियां ने दार्शनिकों के अंदाज में अपनी नाक खुजाई। जबान की मदद से मुंह में इधर-उधर बिखरे पान के बचे हुए अंश को इकट्ठा किया और बोले-‘देखो, कभी ऐसा होता है न कि तुम घर के अंदर बैठे हो और बाहर से तुम्हे किसी घंटी की टन-टन या पोंगे की पों-पों सुनाई देती है।’ 

हम बोले-‘हां, ऐसा होता तो है। जब कोई कुल्फी, आईस्क्रीम या ऐसा ही कुछ बेचनेवाला आता है तो वह घंटी या पोंगा बजाता है...।’

‘...और बच्चे उसकी ओर दौड़ पड़ते हैं।’ भाई मियां ने हमारी बात काटकर कहा- ‘क्योंकि वे समझ जाते हैं कि बाहर उनकी दिलचस्पी की कोई चीज बिक रही है। हालांकि घंटी की टन-टन या पोंगे की पों-पों के बीच वह यह नहीं कहता कि आईस्क्रीम ले लो या कुल्फी ले लो।’ भाई मियां ने एक और पान मुंह में ठूंसकर अपनी बात जारी रखी। बोले-‘तुमने खेतों में अक्सर एक पुतला सा खड़ा देखा होगा। वह पुतला भी दरअसल मानव की संकेत सूचक प्रतिक्रिया का एक अंश है और खेतों में इसलिए लगाया जाता है ताकि जानवरों और पक्षियों से फसल की रक्षा हो सके। हालांकि जानवरों और पक्षियों को देखकर वह मनुष्य की तरह हाथ नहीं फटकारता न मुंह से हाट कहता है लेकिन उसके लगा देने मात्र से ही फसल की रक्षा हो जाती है। है न।’

‘हां, लेकिन...।’

‘मैं वहीं आ रहा हूं शिष्य।’ भाई मियां बोले-‘जरा धीरज धरो। एक मिनट में तुम्हारी चिंता का समाधान किए देता हूं।’ एक पल रुककर वे बोले-‘देखो, जिस तरह रोटी की सही सेंक के लिए आग और रोटी के बीच तवा रखना पड़ता है, उसी तरह एक भावी नेता को अपने और ‘मत’ के बीच दारू और साड़ी-धोती रखनी पड़ती है। इसे इस तरह भी समझा जा सकता है कि दारू और साड़ी-धोती राजनीति की रोटी सेंकने का वह गरम तवा है जिस पर जैसी चाहे वैसी रोटी सेंकी जा सकती है। अगर नेता यह न करे तो रोटी कैसे सिकेगी। और रोटी सिकेगी नहीं तो नेता खाएगा क्या।’  

भाई मियां की दलीलों और उनके सामान्य ज्ञान से हमारा मुंह भाड़ की तरह एक बार इतना खुल गया था कि वहां से हमारे भीतर का लल्लूपन स्पष्ट दृष्टिगोचर होने लगा था लेकिन तत्काल हमने अपना मुंह फिर बंद कर लिया था। आखिर कब तक हम राजनीति का ककहरा सीखने की स्टेज पर ही रहते। 

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