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मजहब नहीं सिखाता, आपस में बैर रखना... (आज बरसी पर खास)

कुछ बात है कि हस्ती, मिटती नहीं हमारी।

सदियों रहा है दुश्मन, दौर-ए-जमाँ हमारा।। 

सारे जहां से अच्छा ...



‘सारे जहां से अच्छा, हिंदूस्तां हमारा...’ और ‘लब पे आती है दुआ बन के तमन्ना मेरी...’ जैसे मशहूर गाने लिखने वाले गैर मुंतकसीम हिंदूस्तान (अविभाजित भारत) के अजीम उर्दू शायर व पाकिस्तान के कौमी शायर (राष्ट्रकवि) अल्लामा इकÞबाल की शायरी का शुमाल उर्दू और फारसी की जदीद दौर (आधुनिक काल) की बेहतरीन शायरी में है। अल्लामा (विद्धान) इक़बाल की पैदाईश 9 नवम्बर सन 1877 में पाकिस्तान के सियालकाट में हुई थी। इकबाल की वालिदा का नाम इमाम बीबी और वालिद का नाम शेख नूर मुहम्मद था। अल्लामा इक़बाल ने तीन शादियां की थीं जिनसे उन्हें एक बेटी मिराज बेगम और दो बेटे आफताब इकबाल और जावेद इकबाल थे। हिंदी, अंग्रेजी के अलावा उर्दू और फारसी ज़बान पर अल्लामा इक़बाल की अच्छी पकड़ थी। उन्हें बेहतरीन कवि और शायर के अलावा सियासतदां और पाकिस्तान के कौमी शायर के तौर पर भी जाना जाता था। 

हिंदूस्तान की जंगे आजादी में उनके तरानों ने रूह फूंकने का काम किया

ब्रिटेन और जर्मनी में पढ़ाई करने के बाद अल्लामा इक़बाल हिंदूस्तान लौट आए। यहां अंग्रेजों के जुल्मो सितम और हिंदूस्तानियों की बेबसी और अंग्रेजों से लोहा लेने के लिए जारी उनकी जद्दोजहद देख उन्होंने लिखा : 


वतन की फिक्र कर नादां, मुसीबत आने वाली है

तेरी बरबादियों के चर्चे हैं आसमानों में,

ना संभलोगे तो मिट जाओगे ऐ हिन्दोस्तां वालों

तुम्हारी दास्ताँ भी न होगी दास्तानों में.


मुहम्मद इकबाल को अल्लामा इकबाल (विद्वान इकबाल), मुफ्फकिर-ए-पाकिस्तान (पाकिस्तान का विचारक), शायर-ए-मश्रिक (पूरब का शायर) और हकीम-उल-उम्मत (उम्मत का विद्वान) जैसे लकब से भी जाना जाता है। इकबाल के बेहतरीन कलाम से मुतास्सिर होकर ब्रिटिश सरकार की जानिब से उन्हें ‘सर’ के लकब से नवाजा गया। मुल्क की हालत को देखते हुए हिंदूस्तान के तकसीम और पकिस्तान के कयाम का ख्याल सबसे पहले इकबाल ने ही उठाया था। अल्लामा इकबाल ने अंग्रेजी जबान में एक किताब भी लिखी है। ‘सारे जहाँ से अच्छा...’ हिन्दी और उर्दू ज़बान में लिखी गई हुब्बुल वतनी (देशप्रेम) की एक गजल है जो जंगे आजादी के दौरान ब्रिटिश राज की मुखालफत की अलामत बनी। जिसे आज भी हुब्बुलवतनी के गाने के तौर पर गाया जाता है। 

दुनिया के मशहूर शायरों में शामिल अल्लामा इक़बाल का इंतेकाल 21 अपै्रल 1938 को हो गया। 


सारे जहाँ से अच्छा...


सारे जहाँ से अच्छा, हिन्दोस्ताँ हमारा।

हम बुलबुलें हैं इसकी, यह गुलिसताँ हमारा।।


गुरबत में हों अगर हम, रहता है दिल वतन में।

समझो वहीं हमें भी, दिल हो जहाँ हमारा।। 

सारे जहां से अच्छा ...


परबत वो सबसे ऊँचा, हमसाया आसमाँ का।

वो संतरी हमारा, वो पासबाँ हमारा।। 

सारे जहां से अच्छा ...

 

गोदी में खेलती हैं, उसकी हजारों नदियाँ।

गुलशन है जिनके दम से, रश्क-ए-जिनाँ हमारा।। 

सारे जहां से अच्छा ...


ऐ आब-ए-रूद-ए-गंगा! वो दिन है याद तुझको।

उतरा तेरे किनारे, जब कारवाँ हमारा।। 

सारे जहां से अच्छा ...


मजहब नहीं सिखाता, आपस में बैर रखना।

हिन्दी हैं हम वतन हैं, हिन्दोस्ताँ हमारा।। 

सारे जहां से अच्छा ...


यूनान-ओ-मिस्र-ओ-रूमा, सब मिट गए जहाँ से।

अब तक मगर है बाकी, नाम-ओ-निशाँ हमारा।। 

सारे जहां से अच्छा ...


कुछ बात है कि हस्ती, मिटती नहीं हमारी।

सदियों रहा है दुश्मन, दौर-ए-जमाँ हमारा।। 

सारे जहां से अच्छा ...


‘इकबाल’ कोई महरम, अपना नहीं जहाँ में।

मालूम क्या किसी को, दर्द-ए-निहाँ हमारा।। 

सारे जहां से अच्छा ...


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