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मुसलमानों के तमाम इदारे वक़्फ नहीं : सुप्रीम कोर्ट

मुसलमानों के तमाम इदारे वक़्फ नहीं : सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली : आईएनएस, इंडिया

सुप्रीम कोर्ट ने वाजेह किया कि मुसलमान के जरीये कायम तमाम इदारों को वक़्फ नहीं करार दिया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि चूंकि वो वक़्फ के दो जमरों और एक मुस्लिम के जरीया बनाए गए एक अवामी ट्रस्ट के दरमियान तकसीम पर गौर करता है, इसलिए वो तमाम मुस्लिम अवामी ट्रस्ट को एक ही ब्रश से पेंट नहीं करेगा और उन्हें वक़्फ करार नहीं देगा। सुप्रीम कोर्ट अदालत ने इस मुआमले पर अपना हुक्म जारी करना शुरू किया कि क्या इस्लाम का दावा करने वाले शख़्स की तरफ से कायम किया गया हर चैरिटी ट्रस्ट बंबई पब्लिक ट्रस्ट एक्ट 1950 और वक़्फ एक्ट 1995 के मुताबिक लाजिÞमी है। जस्टिस केएम जोजफ और ऋषिकेश राय की बेंच बंबई हाईकोर्ट के 2011 के फैसले के खिलाफ महाराष्ट्र स्टेट वक़्फ बोर्ड की अपील पर अपना हुक्म दे रही थी, जहां हाईकोर्ट ने महाराष्ट्र स्टेट वक़्फ बोर्ड के आईन को इस बुनियाद पर एक तरफ कर दिया था कि रियासत में मौजूद शीया या सुन्नी वक़्फों की तादाद के बारे में रियासती हुकूमत के जरीया बोर्ड की कोई सर्वे रिपोर्ट नहीं है। 

हाईकोर्ट ने हिदायत दी थी कि बंबई पब्लिक ट्रस्ट एक्ट 1950 की दफआत तमाम मुस्लिम पब्लिक ट्रस्ट पर लागू होती रहेंगी जब तक कि सर्वे मुकम्मल नहीं हो जाता और वक़्फ बोर्ड की तशकील नहीं हो जाती। बेंच ने कहा, वक़्फ जायदादों से मुताल्लिक मसला को सख़्ती से और कानूनी तौर पर मुनज्जम किया जा रहा है। अगर बॉम्बे पब्लिक ट्रस्ट एक्ट के तहत रजिस्टर्ड अवामी ट्रस्ट हैं, जो दरहकीकत वक़्फ हैं और जो ट्रस्ट एक्ट की दफा 28 के तहत नहीं आते हैं। बेंच ने कहा, उन्हें बिलाशुबा सेंंट्रल एक्ट 1995 के तहत आना चाहिए। बेंच ने वक़्फ के अजजा (सामाग्री, चीजों) पर बहस करते हुए मुशाहिदा किया कि वक़्फ एक्ट में तारीफ से लाजिÞमी शर्त ये है कि वक़्फ किया जाए। वक़्फ वही शख़्स करे जो जायदाद का मालिक हो। दाइमी होना चाहीए। दाइमी का मतलब एक मुद्दत के लिए नहीं हो सकता, हमेशा के लिए होना चाहिए, वक़्फ को मंसूख नहीं किया जा सकता। जो जायदाद वक़्फ का मौजू है, उसे अलग नहीं किया जा सकता। वक़्फ का मकसद होना चाहिए। इस तरह कि मुसलमान को कानून में मजहबी या खैराती के तौर पर मंजूर किया जाए। ये पूरी दुनिया के तकद्दुस (पवित्रता) या मजहबी या खैराती नौईयत का तसव्वुर नहीं है, बल्कि मुस्लिम कानून के तहत ऐसा समझा जाता है। 

अगर अवामी इफादीयत (उपयोगिता) हासिल करने और उसे फरोग देकर वक़्फ बनाया जा सकता है, तो अवामी इफादीयत को मुस्लिम कानून में इजाजत दी गई चीज के लिए होना चाहिए, और मजकूरा शर्त के साथ, खाह फायदा उठाने वाला मुस्लमान हो या ना हो, वक़्फ हो सकता है। बेंच ने मजीद कहा, इस अदालत ने अवामी ट्रस्ट और वक़्फ के दरमियान फर्क को बरकरार रखा है। ये फैसला मुकम्मल तौर पर मुस्लमान पर छोड़ दिया जाएगा कि वो एतिमाद का रास्ता इखतियार करे या वक़्फ करे। वाजेह हो कि सुप्रीम कोर्ट ने ये बातें महाराष्ट्र स्टेट वक़्फ बोर्ड ब मुकाबला शेख यूसुफ भाई चावला और दीगर केस में कही हैं।


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